Thursday, October 25, 2012

हर रोज़

हर रोज़ एक नयी शाम मेरी दहलीज़ पे खड़ी हो जाती है , हर रोज़ हम उससे नज़रे चुराते है
हर रोज़ एक चाय की चुस्की दबे पाँव हंस जाती है , हर रोज़ हम उसे कुछ नयी कहानी सुनाते है
हर रोज़ का है यह किस्सा हर रोज़ दोहराया जाता है , हर रोज़ कुछ बुत बनते है कुछ मुज़स्में उजड़ जाते है
हर रोज़ ज़िन्दगी कुछ आगे बाद जाती है, हर रोज़ हम कुछ कदम बिछड़ जाते है
हर रोज़ ..हर रोज़ कितने नए वाक्यात बनते है कितने पुराने हो जाते है !!

Tuesday, October 18, 2011

भरम..

कभी - कभी पास से ज़िन्दगी यूँ गुज़र जाती है, कि खामोश रातों में भी आवज़ नहीं आती है
जान के अनजाने होने का भरम भी बेमानी है, दिल बिखरता है पर चेहरे पे सिकन नहीं आती है |
आज के दौर के ढंग भी बेतरतीब से है, तबस्सुम छलका के भी आँखों में कितना पानी है
रूह पे दर्द के निशान कहाँ दिखते है कभी, यह कभी तेरी कभी मेरी रुसवाई है ||

मौसम की रुबाइयाँ कब हर किसी को रास आई है, शाम जाती है पर सुबह कहाँ आई है
रोज़ गली के मुहाने पे उम्मीद मिलती है मुझसे यूँ , जैसे सर्द दुपहरी में धूप मिलने आई है |
आज फिर खुद में तेरा अक्स देखा मैंने, जाने इम्तिहान की कौन सी घड़ी आई है
भूलना मुश्किल है पर क्यूँकर तुझे याद करूँ, तेरी राह मेरी मंजिल के करीब से कब गुज़र पाई है ||

Saturday, October 1, 2011

कशमकश ..

कब तलक टूटे तारों में दुआएं बसेंगी
इक रोज़ वो दिन भी आयेगा, जब दवा असर करेगी
आँख मूँद के रिवाजों की सरपरस्ती भी कारगर है कभी
नए आगाज़ को क्यूँकर तवज्जो  देनी ही पड़ेगी ||

जो सर्द हवा का मौसम आया है शहर में
गलियों की नुमाइश अब खिड़की से दिखेगी
बंद दरवाज़ों पे अँधेरा इत्मीनान से बैठा है आजकल
रौशनी भी कहाँ कम है अब झरोखों से छनेगी ||

शाम की महफ़िले तक़रीर में बदलती सी दिखी
गोया चांदनी चरागों से कम पड़ने लगी
यूँ तो सूरज भी छुपा करता है बादलों में कभी
फिर भी धूप की तासीर बदली है कहीं ||

Thursday, July 14, 2011

खाख के बाशिंदे

कुछ नूर है फिर बरसा; कुछ आँख हुई झिलमिल,शबनम के कतरों को मोती सा सजना है |

फिर लौ है कुछ मद्धम; फिर बिखरा है आज यह मन,रूठे हुए सपनो को फिर आज मनाना है |

उड़ते परिंदों की तान है बोझिल सी, आकाश से बरसा अमृत फिर धूल में मिल जाना है |

हम खाख के बाशिंदे है; क्या नाता रौशनी से, चिंगारी से उबरना है; धुएं में डूब जाना है |

दुनिया की नसीहतों में दस्तूर पुराना है; ठहरे हुए रस्तों पे बढ के आगे जाना है |

शबनम के कतरों को मोती सा सजना है |

Tuesday, August 31, 2010

ईश्वर का मंदिर दर्शन

आज ईश्वर ने स्वयं के शुभप्रभात की सुध ली,
मंदिर में भक्तों को आशीष बाँटने के कार्यक्रम से आगे की गिनती की,

एक महानुभाव ने अपनी पुरानी पादुका छोड़ दूसरे की नयी उड़ाई
और साथ ही गुहार लगाई ..प्रभु आज बचा लो और कल का प्रसाद पक्का
पचास की चप्पल में पच्चीस मेरा पच्चीस मोटे पण्डे का हिस्सा,
आपके मंदिर का ही भला होगा..और इस मंहगाई में इक जोड़ी चप्पल से क्या भला होगा
भगवन भक्त की इच्छा पूरी करो आज के चड़ाए बताशे का कुछ तो ध्यान धरो !

आगे की घटना और भी विचित्र है मंदिर के पुजारी की जेब में वी आई पी भक्तों का घूस है,
जल्दी दर्शनों के लिए यह रास्ता भी उपयुक्त है आखिर कलयुग में ईश्वर के लिए समय निकलना भी कष्ट है
अजीब भ्रम ही स्थिति है भाई अब तो सेठ जी की काली कमाई को गोरा बनाना है
और थुलथुल ह्रदय रोगी को लम्बी आयु वरदान भी अजमाना है!

सीडियों पर जमा भिखारी भी त्रस्त है आज का हर भक्त अवसाद ग्रस्त है
हर कोई अपनी समस्यायों में उलझा है और सारा गुस्सा बिचारे दीन-हीन पर निकलता है ,
पर यह भी महोदय कुछ कम नही जिद करके इक का दो रुपया करवाते है
और चडावे के चार आने भी लाख वादों के बाद भी ईश्वर तक नहीं जाते है!

पंक्ति में कड़ी अस्सी वर्षीय महिला में नवयुविका जितना जोश है
हाथ का नारियल अगर सामने वाले के सर के टकरा के फूटे तो इनका क्या दोष है
घुटनों ने जवाब दिया है मन ने नहीं
ईश्वर की कृपा से रबरी खाने इससे बेहतर मौका और कहीं नहीं
इनका भी मामला खासा गंभीर है; जबान पे है मिठाई और शुगर से बचने का अनुरोध है !

प्रभु अब अपने इस सवेरे से परेशान है ,
सोचते है किसकी विनय माने और किसको दंड का भागी बनाये
दुनिया के रंग भी निराले है,
जो ईश्वर को दुविधा में दाल दे वह हम आपको क्या छोड़ेगी
पाप की दुपहरी में नैतिकता कितना मूल्य जोड़ेगी
अपने चुनाव पे अड़े रहिये और जितना कर पाए देवों को भ्रमित करिए ॥

जीवनबाला

कुछ तोल-मोल की बातों में अनमोल वचन मिल जाते है,
हम रह जाते है ठगे जैसे वह मुस्काते चले जाते है,

विचलित मर्यादा का बंधन है वह धीर धरे सकुचाती है,
हम मोहपाश में बंधे हुए जाने किधर खिंचे जाते है,

चेहरे पर स्वर्णिम तेज सजा नैनों की बिजली घात करे,
निष्कपट वेग वह स्वासों का बिनमोल बिके चले जाते है,

माथे पर लिपटे स्वेदकण वायु के कम्पन से टकराते,
झिलमिल से अधरों की थिरकन कुछ और व्यथित कर जाते है,

यह जीवन रुपी बाला है अगणित मोहक से रूप धरे,
हम लाख हताश हो जाये कहीं यह पुनः सम्मोहित कर जाती है,
यह पुनः सम्मोहित कर जाती है|

Tuesday, August 3, 2010

दस्तक

नाज़ुक सी निगाहों में अनजान फसाना है; दिल पे कोई दस्तक है यह ख्वाब पुराना है ,
हम ढूंढते जिसको है ; वो अफ्सानो का पुतला है ,
कभी ख्वाब हकीकत है ; कभी हकीकत इक फ़साना है ,
मसरूफ सी ज़िन्दगी का ; अधूरा सा यह बहाना है ,
फिर वक़्त की तंगी है ; फिर वक़्त बेगाना है |
नाज़ुक सी निगाहों में अनजान फसाना है; दिल पे कोई दस्तक है यह ख्वाब पुराना है ,
आज छोड़ के सब बंधन ; दिल से इक साज़ चुराना है ,
फिर रूह को आज अपनी इक ताल पे इतराना है ,
कुछ दर्द छुपाने है ; कुछ दर्द तराना है ,
यूँ राहे आशिकी की मंजिल तक जाना है |
नाज़ुक सी निगाहों में अनजान फसाना है; दिल पे कोई दस्तक है यह ख्वाब पुराना है |